सरकार द्वारा देश वासियो के लिए छोड़ा गया सगुफा

नोटबंदी के पचास दिन से ज्यादा हो गये, इन पचास दिन में 130 लोग ऐसे थे जो कतारो में खड़े खड़े मर गये, मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन मे गर्भवती महिलाओं को छ: हजार रुपये देने की घोषणा कर दी। मानो यह एक तरह की रिश्वत थी जिसने जिसने सभी की जबान बंद कर दी, विपक्ष की भी, लाईन में खड़े आम आदमी की भी। अब नोटबंदी पर कोई चर्चा नहीं हो रही है न मीडिया में न ही सोशल मीडिया में लगता है सारा ‘काला धन’ वापस आ गया है। और अब बहुत जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं। मगर वे जो 130 लोग लाईन में लगकर मरे हैं उनका क्या अगर 260 मर जाते तो ?  अगर एक हजार मर जाते तो ? क्या उनका तब भी कुछ होता ? हालात ऐसे हैं कि तब भी कहीं से विरोधी स्वर सुनने को नहीं मिलते और अगर मिलते भी तो मीडिया उन आवाजों को ‘अच्छे दिन’ के शौर में दबा देता। भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी गोल मेज पर बैठकर लाईन में लगे लोगों को मजाक उड़ा रहे थे कि कैसे देशभक्ती के नाम पर लोगों का उल्लू बनाया है, और लोग भी कितनी आसानी से उल्लू बन रहे थे। बहरहाल असल सवाल है कि इस नोटबंदी से कितना तो लाभ हुआ कितना फायदा हुआ ? तीन महीनो होने को जा रहे हैं क्या सरकार बता सकती है कि उसने कितना कालाधन प्राप्त किया है ? क्या सरकार बता सकती है कि जो कालाधन उसने प्राप्त किया है वह किसके पास से बरामद हुआ है ?

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