2002 गुजरात दंगों के पीड़ितों के लिए झटका: केंद्र ने सरकारी भर्ती में छूट वापस ली
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| फ़रवरी और मार्च 2002 में घरों और दुकानों को सांप्रदायिक भीड़ूँ की लगाई आग के धुओं से भरा अहमदाबाद का आसमान |
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक आदेश जारी कर 2002 के गुजरात दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरियों में दी जाने वाली आयु सीमा छूट को रद्द कर दिया. यह सुविधा 2007 से लागू थी, जिसके तहत पीड़ितों के बच्चों या रिश्तेदारों को केंद्र सरकार के विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए आयु में छूट दी जाती थी.
नायर ने 2007 में मंत्रालय द्वारा जारी पूर्व आदेश का उल्लेख करते हुए बताया कि आयु सीमा में दी गई छूट को तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया गया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आयु छूट अर्धसैनिक बलों, इंडिया रिजर्व (आईआर) बटालियनों, राज्य पुलिस बलों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा केंद्र व राज्य सरकार के अन्य विभागों में भर्ती के लिए लागू थी.
गुजरात दंगों के पीड़ितों को भर्ती में आयु सीमा छूट और अतिरिक्त अनुग्रह राशि जैसे लाभ प्रदान किए जाते थे. 2002 के इन दंगों में गुजरात में सैकड़ों लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकांश मुस्लिम समुदाय के थे.
गौरतलब है कि गुजरात में हिंसा की शुरुआत 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के दो डिब्बों में आग लगने की घटना के बाद हुई. इस घटना में 58 लोग मारे गए, जिनमें कई महिलाएं और बच्चे शामिल थे. आरोप है कि इस घटना को एक मुस्लिम भीड़ ने अंजाम दिया था. मारे गए अधिकांश लोग हिंदू कारसेवक थे, जो अयोध्या से विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के राम मंदिर अभियान में हिस्सा लेकर लौट रहे थे.
राना अय्यूब ने अपनी किताब गुजरात फाइल्स में लिखा है कि 2002 के गुजरात दंगों और उसके बाद के घटनाक्रम में प्रवीण तोगड़िया ने हिंदुओं को भड़काने का काम किया था. विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकर्ता उस दौरान बेलगाम होकर घूम रहे थे. गुजरात में दिए एक भाषण में तोगड़िया ने कहा था: (पेज 91)
"गोधरा स्टेशन पर आतंक फैलाया गया, क्योंकि यह देश गांधी का अनुसरण करता है. हमने 28 फरवरी को गांधी को ताले में बंद कर दिया था. (मुसलमानों से) कहा गया, 'अपने आप को सुधार लो, नहीं तो हम गांधी को हमेशा के लिए भूल जाएंगे.' जब तक हम गांधी की नीतियों का अनुसरण करते रहेंगे और मुसलमानों के सामने घुटने टेकते रहेंगे, तब तक आतंकवाद को खत्म नहीं किया जा सकता। मेरे भाइयों, हमें गांधी को खारिज करना होगा."
उन्होंने यह भी कहा कि ट्रेन के डिब्बों में लगी आग हनुमान जी की पूंछ में लगी आग के समान थी.
नरेंद्र मोदी (वर्तमान में प्रधानमंत्री) और प्रवीण तोगड़िया कभी गुजरात में हिंदुत्व के विकास के पर्यायवाची माने जाते थे. दोनों एक साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में जाया करते थे. कहा जाता है कि वे एक ही मोटरसाइकिल या स्कूटर पर सवार होकर संघ की विचारधारा को गुजरात में फैलाते थे.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही यह भाईचारा कमजोर पड़ने लगा था.
रिपोर्ट में लिखा गया कि दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनावों में तोगड़िया ने लगभग दो सप्ताह तक बिना रुके हेलीकॉप्टर से यात्राएं कीं और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के समर्थन में सौ से अधिक रैलियों को संबोधित किया. जब मोदी चुनाव जीत गए, तब परिस्थितियां बदल गईं. उन्होंने तुरंत झड़फिया (तोगड़िया के करीबी सहयोगी) को अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया और तोगड़िया को स्पष्ट संदेश दे दिया कि शासन में अब उनके हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. इसके बाद तोगड़िया और संघ परिवार के अन्य संगठनों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया को भी रोक दिया गया.
नरेंद्र मोदी ने एक गुप्त बैठक बुलाई थी. इस बैठक में उन्होंने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से आग्रह किया था कि हिंदुओं को अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ अपना गुस्सा निकालने की अनुमति दी जाए.
दंगों में पुलिस की भूमिका को समझने के लिए पूर्व पुलिस आयुक्त पी.सी. पांडे (जो गुजरात दंगों के समय अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त थे) के बयान से बेहतर कुछ नहीं हो सकता. द टेलीग्राफ ने 2 मार्च 2002 को उनके हवाले से लिखा था:(पेज 127)
"पुलिस सामाजिक परिवेश से अछूती नहीं रहती... जब सामाजिक धारणा में बदलाव होता है, तो पुलिस भी उस बदलाव का हिस्सा बनती है, और इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है."
गौरतलब है कि पॉडकास्टर लेक्स फ्रिडमैन को दिए एक हालिया साक्षात्कार में मोदी ने कहा कि गुजरात में सांप्रदायिक दंगों का लंबा इतिहास रहा है, जो उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले से चला आ रहा था. उन्होंने हिंसा से पहले आतंकवादी हमलों की 'पृष्ठभूमि' की ओर भी इशारा किया.
वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने दंगों की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी) की क्लोजर रिपोर्ट को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला.

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